DSCN1943 DSCN1966 (1)

Today, Bookaroo in the City together with The Delhi Public Library was at The Blind School in Shahadra. There were 25 boys between the 8 and 15 accompanied by their six teachers.The children and teachers were visibly overjoyed to welcome Devndra Mewari, agricultural scientist and author of children’s books about science. Derived from common folklore and one which has been handed down generations, Devendra told the story of a clever goat that saves a family from a notorious jackal. Devendra is native of the Uttrakhand Mountains and his story painted a picture as vibrant as his village nestled in the hills. During his story he would occasionally pause to caricature bird calls of species found in the hills. The children joined in with equal enthusiasm. The bird calls were soon followed by an expansive list of animals that inhabit the forests of Uttrakhand. Soon the school was transformed into a riot of animal and bird calls, a whooping success.

After Devendra had finished, he asked the kids what they had understood from the story. Eagerly, all hands went up and they shared how the stupid jackal was fooled by the clever goat. Some of the boys also told their own stories, poems and songs. One had heard of Bookaroo on the radio earlier and was stupefied to have Bookaroo visit them the same day, “Mein soch raha tha ki hamare school me yeh kyo nahin hota”, said a delighted Nikhil.

Considering the enthusiasm, Devendra lavished the audience with yet another of his tales which was excitedly lapped up by one and all.

Raminder Banerjee

Author’s write up of the session in Hindi.

लोककथाओं के कल्पना लोक में देवेंद्र मेवाड़ी

आज भारतीय नेत्रहीन विद्यालय, तेलीवाड़ा, शाहदरा (दिल्ली ) के 25 नेत्रहीन बच्चों के साथ मन की आंखों से लोककथाओं के कल्पना लोक की सैर की। हमारी इस अनोखी सैर की आयोजक थीं, पुस्तक संस्कृति को बढ़ावा देने वाली गैर सरकारी संस्था, बुकरू और दिल्ली पब्लिक तेलीवाड़ा की एक गली में समाजसेवी लोगों के दान से चलने वाले इस विद्यालय में पहुंचे तो बच्चे हमारे आसपास मंडरा कर मन की आंखों से हमें देखने-पहचानने की कोशिश करने लगे। हमने पूछा, “जानते हो बच्चो, हम क्यों आए हैं?” वे बोले, “कहानी सुनाने। आपका प्रोग्राम है यहां।” उन्हें पता था कि उन्हें आज कहानियां सुनाई जाएंगीं। अभी समय था, इसलिए हम कक्षाएं, बच्चों के रहने के कमरे, किचन वगैरह देखने के लिए विद्यालय की पहली-दूसरी मंजिल पर गए। बच्चे, हालांकि भौतिक आंखों से नहीं देख सकते थे, लेकिन उनकी मन की आंखें बहुत तेज थीं। वे आराम से सीढ़ियां चढ़-उतर कर कमरों में आ-जा रहे थे। छत पर धूप खिली हुई थी। दो बच्चे आए और हाथों के स्पर्श से पहचान कर धूप में सूख रही अपनी रजाइयां समेट कर सीढ़ियों से उतर गए। टेबल-बैंच लगे भोजन कक्ष के पास ही रसोई थी। बगल की ऊंची इमारत की छत पर तीन-चार युवक अपने पालतू कबूतरों के झुंड को आकाश में उड़ा रहे थे-आ! आ! आ! आक-आक-आक। वे कभी तेज आवाज में दीवाल पर चटाक् से पट्टा चटकाते और कभी आक-आक करते तेज सीटियां बजाते। विद्यालय की छत पर आते विद्यार्थी और शिक्षक हालांकि नीले आसमान में उड़ते कबूतरों का झुंड नहीं देख पा रहे थे लेकिन आवाजों के बिंब उनके मन के आकाश में कबूतरों के झुंड के झुंड उड़़ा रहे थे। इसी बीच भूतल पर कहानी सुनने के लिए लालायित 25 बच्चों का झुंड आकर दरी पर बैठ गया। दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी से सुधा जी, रोमिला जी और उनके ब्रेल विभाग के सहयोगी भी हमारे साथ थे। मन की आंखों से देखने वाले उनके शिक्षक, राजेंद्र कुमार शर्मा, जयप्रकाश यादव, दिनेश, प्यारेलाल और आशा शर्मा जी भी बच्चों के बीच मौजूद थे। हिंदी- संस्कृत के शिक्षक राजेंद्र कुमार शर्मा ने बच्चों के बीच हमारा स्वागत किया। मैंने बच्चों से कहा, “दोस्तो, आज हम लोककथाएं सुनेंगे। उत्तराखंड की लोक कथाएं। मैं वहीं से हूं। मेरा जन्म जिस गांव में हुआ उसके चारों ओर घने, घनघोर जंगल थे जिनमें हजारों पंछी चहचहाते थे। उनमें बहुत सारे वन्य जीव रहते थे-बाघ, भालू, सियार, बंदर, लंगूर…….और गांव में हमारे साथ हमारे पालतू पशु रहते थे। दोस्तो, तब मां मुझे लोकथाएं सुनाया करती थी। उनमें से एक लोककथा है, ‘होशियार बकरा।’ चलो, सुनते हैं वह कथा।” उन्हें जंगल के विभिन्न जानवरों की अलग-अलग आवाजें सुना कर मैंने उनकी मन की आंखों के लिए जंगल का दृश्य बनाया और फिर उन्हें उस होशियार बकरे की कहानी सुनाई जिसने एक धूर्त सियार से अपनी पत्नी, बकरी और बच्चों की जान बचाई। कहानी सुन कर बच्चों ने कुछ प्रश्न भी पूछे और राहुल ने स्वयं भी एक कहानी सुनाई। गौरव ने मुंह से शंखध्वनि निकाली और इंद्रपाल तथा रवि ने कविता सुनाई। सचिन, आमिर, निखिल और अन्य बच्चों ने भी अपनी बात कही। फिर मैंने उन्हें एक और लोककथा सुनाई, “चल तुमड़ी बाटै- बाट! ” यानी, चलो तूंबी रास्ते ही रास्ते। उसमें एक बूढ़ी अम्मा और उसकी होशियार बेटी का कारनामा सुनाया कि घने जंगल में शेर, बाघ, भालू और भेड़िए से कैसे बूढ़ी अम्मा की जान बची। दृष्टिबाधित नन्हे दोस्तों के साथ कहानी सुनने-सुनाने का यह मेरा पहला अवसर था। मुझे बहुत खुशी हुई कि मैं उन्हें आवाजों के सहारे लोककथाओं के कल्पना लोक की सैर करा सका। उनसे फिर मिलने का वायदा करके हम लौट आए।

Advertisements